Wednesday, June 29, 2005

माजरा क्‍या है

पहले पढ़ सुन कर तो लगा इस बार बड़ा कॉमन सा विषय मिला है अनुगुँज के लिए, कॉमन इसलिए कह रहा हूँ क्‍योंकि ये ३ शब्‍द अक्‍सर लोगों के मुहँ से एक दूसरे को कहते हुए सुने जा सकते हैं। मसलन, "अरे मिंयाँ आज बड़े चहक रहे हो 'माजरा क्‍या है' और या फिर कभी आफिस Anugoonja में कोई सूट-बूट पहन के आ जाये तो सब उसे ऐसे देखते हैं जैसे पूछ रहे हों, भई 'माजरा क्‍या है'। अब वैसे तो कुछ भी लिखने में ऐसी कोई बंदिश नही लकिन इसका मतलब यह नही कुछ भी परोस दिया जाय तो सोचा कुछ और सोचते हैं। यहीं असलियत का एहसास हुआ कि विषय जैसा दिखायी देता है वैसा है नही। चन्‍द लाईन लिखने के लिए ना ही दिमाग ने साथ दिया ना दिल ने। अब जब दिल और दिमाग साथ छोड़ दें तो भला कोई क्‍या कर सकता है, हम भी बैठ गये हाथ पर हाथ रख कर।

फिर कुछ दिनों बाद महावीर जी के लेख पर छपी फोटो और उसकी पीछे छुपी कहानी का पता चला। शांत बैठे दिल और दिमाग तो हकबका के खड़े हुए ही साथ में अंदर बैठे निठ्‌ल्‍ले ने भी अंगड़ाई ले ली। निठ्‌ल्‍ले के उठने से हमें इस बात का एहसास हो गया कि आगे की कहानी का तियां-पाँच होने वाला है। दिल और दिमाग के तेवर ने रंग दिखाया और सबसे पहले उस फोटो को लेकर अंग्रेजी ब्‍लोग में अपना आक्रोश कलमबद्व कर दिया। धांसू दिमाग में आइडिया आया कि इसी को 'माजरा क्‍या है' का पता लगा के पोस्‍ट कर दिया जाये, आम के आम गुठलियों के दाम या कह सकते हैं 'हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा'।

जैसे ही एक धर्म विशेष के भगवान की फोटो मिलैनी निर्मित जूतों में देखी, दिमाग में रक्‍त ने उबाल लिया और दिल हाहाकार कर उठा, ये क्‍या एक बार फिर से ऐसा मंजर। इन व्‍यवसायिक लोगों को कोई और डिजाइन नहीं मिला। खूब गालियाँ निकाली, किसी की फोटो ऐसे जूतों में छापना........हद है। यह मुआ अपनी ही फोटो क्‍यों नही छपता। अंदर से निठ्‌ल्‍ले की आवाज आयी, देखो मिंयाँ "सेक्‍यूलर होने का इससे अच्‍छा मौका फिर नही मिलेगा"।

अपनी समझ में बिल्‍कुल नही आया कि धर्म निरपेक्ष होने का जूतों से क्‍या ताल्‍लुक। इसलिए पूछ लिया, "वो भला कैसे"। निठ्‌ल्‍ला बोला, एक जोड़ी ये जूते ले लो, और फिर ऐसे ही एक-एक जोड़ी अलग-अलग धर्मों से जुड़े लोगों की फोटो छपे जूतों की ले लेना। अगर नही मिल पाये तो अपने देश में तो हर चीज का जुगाड़ है, इसका भी हो जायेगा। बस फिर, सुबह शाम जय-जय करना और दिन में शान से एक पांव में एक दूसरे मे दूजा पहन के निकलना। अलग-अलग धर्मों के देव एक साथ घुमने निकलेंगे, घर में ही मन्‍दिर, मसजिद, गुरूद्वारा और चर्च, सब एक जगह; मन्‍दिर और मसजिद का कोई झगड़ा ही नही। अब इससे बड़ी धर्म निरपेक्ष की कोई मिसाल मिलेगी।

दिल, दिमाग पर हावी हुआ तो हम निठ्‌ल्‍ले को बोले, तू तो मरेगा और हमें भी मरवायेगा। जानता भी है किस की बात कर रहा है, निठ्‌ल्‍ला बोला, हाँ उसी की जिसके लिये ना कुछ "हिंदू पार्टी के मुँह से सुनायी देता है", "ना मुस्‍लिम" और ना ही "तथाकथित धर्म निरपेक्ष पार्टी के मुँह से"। बात में तो कुछ दम था, मुँह खोलते हुए तो हमने भी ना देखा, ना ऐसा कुछ सुना। लेकिन हमने निठ्‌ल्‍ले को सफाई दी, देख भाई अभी कोई इलेक्‍शन जो थोड़ी है जो ये ऐसी किसी बात पर मुँह खोलेंगे। इन्‍हें जब एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से फुरसत मिलेगी तो ये भी बोलेंगे। बोलने से कुछ नही बनेगा तो थोड़े दंगे करवा देंगे, अपने ही देश की जर जमीन जायदाद का नुकसान करवायेंगे.... "और उसके बाद एक दूसरे को इसका दोषी ठहरायेंगे", निठ्‌ल्‍ले ने मेरी बात को पूरा किया।

अच्‍छा निठ्‌ल्‍ले एक बात बता इन्‍हें अपने ही देवगण क्‍यों मिलते हैं अपने डिजाइनर काम के लिए, आखिर "ये माजरा क्‍या है"। सिंपल, क्‍योंकि इन्‍हें पता है हम में से कुछ सेक्‍यूलर बने बैठे हैं, इसलिए कुछ कहेंगे नही; और कुछ शायद शर्म के मारे कुछ ना बोले, अब बचे कुछ चंद मुठ्‍ठी भर लोग, अगर इन्‍होंने हल्‍ला बोला तो ठीक नही बोला तो इनकी तो निकल पड़ी ना। दूसरा, बाकी सब के पास एक अपने पास छत्‍तीस करोड़ इसलिए भी प्रोबेबिलीटी थोड़ा बड़ जाती है। योग गया, आयुर्वेद गया शायद अब इसकी बारी हो। बात थोड़ा समझ में आ रही थी, हम दुनिया से "सर्व धर्म सद्‍भावना" कहते रहे और वो दुनिया वाले इसी तरह हमें गच्‍चा देते रहे। हम भी ताव में आने लगे थे, निठ्‍ल्‍ला बोला अब ज्‍यादा ताव खाने की जरूरत नही है, उन्‍होंने जूते वापस ले लिये हैं। हमने कहा जूते ही तो वापस लिये हैं अभी लिखित में माफी तो नही मांगी। निठ्‍ल्‍ला बोला इससे बड़ी बड़ी बात हो जाती है कोई माफी नही मांगता, "माफी मांगने से कोई छोटा नही होता ये गुजरे जमाने की बात थी" इस जमाने का दस्‍तूर नही। आज के इस दौर में माफी तभी मांगी जाती है जब अपना कोई काम हो नही तो हमको क्‍या। आखिर था तो हिंदुस्‍तानी खून, इतने से ही ठंडा पड़ गया, ऊपर से पढ़े लिखे होने ठप्‍पा. इस बात का भी तो डर था कहीं कोई अनपढ़ गंवार ना कह दे। हमें लग गया था हम बिल्‍कुल सीमा पर खड़े हैं, कब किस करवट जा बैठें हमें खुद नही पता।

ये तो बात हुई एक माजरे की अभी तो ऐसे ही ना जाने कितने माजरे पड़े हैं, उनके शब्‍द पहनाने की बजाय क्‍यों ना इंतजार किया जाय उस घड़ी का जब बजाय "माजरा क्‍या है" कहने के, हम कहें ओ हो अच्‍छा "तो माजरा ये है"। लेकिन फिर चलते चलते, निठ्‍ल्‍ले ने पीछे से दाग ही दिया - "२४ घंटे में मुश्‍किल से कभी १२ घंटे बिजली आती है, सड़कों की हालत पगडंडी जैसी होती जा रही है, कोर्ट में केस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है, देहली और बोम्‍बे को छोड़ कहीं कोई डेवलपमेंट नहीं इसलिये जनता इन्‍हीं शहरों को दौड़ी चली जाती है, कॉल सेंटर के अलावा कहीं कोई नौकरी नहीं, सरकारी नौकरी में आरक्षण के अलावा कोई काम नहीं, बिल जमा करने को अभी भी घंटों लाईन में लगना पड़ता है, फोन और इंटरनेट का कनेक्‍शन मिलने में अभी भी कई दिन लग जाते हैं, सरकारी बाबू अभी भी पैसे खाये बिना कुछ नही करते, पब्‍लिक स्‍कूल में इंगलिश और सरकारी स्‍कूल में हिंदी बदतसूर जारी है, अमीर और गरीब का फर्क बड़ता जा रहा है, नियम-कानून पर अभी भी किसी को भरोसा नही, सरकारी पार्टियां देश की आबादी की तरह बढ़ती हीं जा रहीं हैं, पहले किसी और की नीति थी "फूट डालो राज करो" और अब ये इन राजनीतिक पार्टियों की नीति है, जाती के नाम पर; भाषा के नाम पर; धर्म के नाम पर अभी भी सब लोग बंटे हुए हैं, अभी भी आधे से अधिक जनता अनपढ़ है, छूत छात अभी भी जारी है, महिलाओं को ज्‍यादातर लोग अभी भी पैर की धूल से ज्‍यादा नही समझते, इनफ्रास्‍ट्रकचर की अभी भी कोई बात नही करता...............फिर कुछ चंद लोग मीडिया में, न्‍यज पेपर में ये कैसे कहते रहते हैं कि अगले २५-३० सालों में हम एक सुपर पावर होंगे, दुसरे नम्‍बर पर होंगे वगैरह वगैरह...." आखिर कोई तो बताये, भला ये "माजरा क्‍या है"।

Sunday, June 19, 2005

कुमांऊनी होली - संगीत और रंगों का त्‍यौहार

होली के वक्‍त अंग्रेजी ब्‍लोग में लिखे लेख का अनुवाद, वैसे ही जैसे बेमौसम की बरसात।

फाल्‍गुन के महीने होली का आना अक्‍सर मुझे ले जाता है बहुत पीछे बचपन की उन गलियों में, जहाँ न कोई चिन्‍ता थी और ना ही नौकरी का टेंशन सिर्फ मस्‍ती और हुड़दंग। अपने जीवन की अधिकतर मस्‍त होली मैंने अपने बचपन में ही मनायी और वो भी अपने 'नेटीव प्‍लेस' उत्तरांचल में। यहाँ की होली अपने आप में अनुठी होती है, क्‍योंकि यहाँ होली संगीत का उत्‍सव पहले है, रंगों का बाद में। चाहे वो बैठकी होली हो, या खड़ी होली और या फिर महिला होली।

मुझे अब भी रंगों से भरे वो गुब्‍बारे याद हैं जो अक्‍सर हम एक दूसरे को मारा करते थे, हमारे मोहल्‍ले में आने वाले भी इन गुब्‍बारों की मार से नहीं बच पाते। होली के दौरान हम एक ओर मजेदार खेल खेला करते थे। हम एक रस्‍सी या धागे से एक लोहे की खुंटी (हुक) लगाते और फिर कुछ बच्‍चे छत में जाकर एक छोर थामे रहते और कुछ नीचे सड़क में खुंटी लेकर इंतजार करते रहते, उन आदमियों का जो सिर पर टोपी पहने हमारे सामने से गुजरते। जैसे ही ऐसा कोई मुर्गा आता, कोई ना कोई जाकर उस हुक को उसकी टोपी में फंसा देता, इससे पहले कि कोई सोचे क्‍या हुआ, उसकी टोपी हवा में। कुछ लोग पहले गुस्‍सा दिखाते फिर वो भी इसका मजा लेते। हमारे ज्‍यादातर शिकार नेपाली डोटियाल (कुली) या फिर हुलियार (कुमांऊनी शब्‍द है, होली गाने वाले व्‍यवसायिक और प्रशिक्षित गायक, जो चुड़ीदार पायजामा, कुर्ता और सिर पर ट्रेडिसनल कुमांऊनी टोपी लगाये रखते हैं) होते थे। लेकिन अब ऐसे दिन कहाँ। अब कुछ कुमांऊनी होली के बारे में।

बैठकी और खड़ी होली में मन को लुभावने वाले बोलों से भरे गीत गाये जाते हैं। ये गीत मुख्‍यतया क्‍लासिकल राग पर बेस्‍ड होते हैं। बैठकी होली की शुरूआत किसी मंदिर के आँगन से होती है, जहाँ हुलियार और काफी सारे लोग होली गाने को इकट्‍ठा रहते हैं।

होली से लगभग एक महीने पहले से, उत्तरांचल की वादियों में होली के गीतों की आवाज सुन सकते हैं, जहाँ लोग रात को आग के चारों ओर बैठ कर स्‍पेशियल होली के गीतों (कुमांऊनी बोली के गीत) को गाते हुए सुने और देखे जा सकते हैं।
लोकल परंपराओं के अनुसार, होली से ठीक एक सप्‍ताह पहले शुरूआत होती है, कुमांऊनी 'खड़ी होली' की। जिसमें लोग गाने के साथ-साथ हुलियारों और अपनी आवाज की धुन में थिरकते दिखायी देते हैं। यह सब रात के वक्‍त चीर (होलिका दहने के लिए लाया गया पेड़, जैसे क्रिसमस ट्री लगाया जाता है) के चारों ओर नाच गाकर मनाया जाता है।

और फिर अंतिम दिन (दुलहेंदी के पहले की रात) उस चीर को जलाया जाता है, जिसे होलिका दहन कहते हैं। उस दिन देर रात तक नाच गाना चलता रहता है। इसी सप्‍ताह होली के समुह जगह-जगह जाकर होली गाकर चंदा इकट्‍ठा करते रहते हैं। और फिर दुलहंदी के दिन मचता है, धमाल तरह तरह के रंगों का, मिठाई, गुजिया और भांग (एक पेय पदार्थ जो केनाबिस बीज से बनया जाता है) का।

संक्षिप्‍त में कहा जाय तो, खुशी और मस्‍ती का ही आलम होता है होली के दौरान। ढोलक और मंजीरे की तान में नाचते गाते लोग कुमाँऊ की सड़कों में, मोहल्‍लों में आसानी से देखे जा सकते हैं। ऐसा लगता है जैसे बच्‍चे, जवान, बुढ़े, आदमी, औरत सभी अपने आप में क्‍लासिकिल गायक हों। जैसे मैंने पहले कहा होली के दौरान गाये जाने वाले गीत न सिर्फ रागों में बेस्‍ड होते हैं बल्‍िक उनके गाने का भी स्‍पेशियल वक्‍त होता है। उदाहरण के लिए, दिन के वक्‍त वो ही गीत गाये जाते हैं जो कि पीलू, भीम पलासी या सारंग राग में बेस्‍ड होते हैं जबकि शाम का वक्‍त होता है कल्‍याण, श्‍याम कल्‍याण और यमन राग पर बेस्‍ड गीतों का।

काश फिर कभी मैं किसी होली में जाकर देख पाता कि अभी भी वो मस्‍ती, गीत और मदहोशी का आलम वैसे ही बरकरार है या फिर वक्‍त के साथ कहीं खो गया है।

Monday, June 13, 2005

बिखरती दुनिया

अरे नहीं जनाब, मुझमे वो कुव्‍वत कहाँ। मैं तो खुद अपनी ही किसी जद्दोजहद में उलझा हुआ था। टैम्‍पो रूका हुआ था, इशरत अली सोच रहा था ना जाने कहाँ से ये नामाकूल थानेदार आ टपका, उसने बाहर झांक के देखा दुकान पास पर ही थी, अली ने टैम्‍पो से उतरने में ही भलाई समझी।

टैम्‍पो से ऊतर के इशरत अली अपने मुक्‍कदर् को कोसता हुआ दुकान की तरफ बढ़ गया। सलाम वालेकुम, इशरत अली कम्‍पयूटर आपरेटर को बोला. शायद उसके मुक्‍कदर् को अपने को कोसना पसंद नही आया तभी उसे आज अपनी गद्दी दुकान से नदारद दिखी। जिस डर को लेकर जी रहे थे वह सोच के ही बुढी होती हड्डियों में कंपकंपी सी छुट गयी। "मोहतरमा मेरी गद्दी का कुछ पता है", इशरत अली ने कम्‍पयूटर आपरेटर से पूछा। आपरेटर अन्‍जान बनते हुए बोली "मुझे नही मालूम मिंया, मालिक ही बेहतर जानते हैं"।

"सलाम वालेकुम जनाब", इशरत दुकान के मालिक के पास पहुँच के बोला। "और इशरत मिंया, तशरीफ से आये"। "हाँ जनाब, लेकिन लगता है आज लड़को ने सफाई के वक्‍त मेरी गद्दी कहीं रख दी"। "अरे मिंया आओ इधर बैठो" दुकान का मालिक इशरत की बात को अनसुनी करते हुए बोला। इशरत सोच रहे थे कि हंसे या रोयें, पहली बार दुकान मालिक के छोकरे ने इज्‍जत बख्‍शी थी। डरते डरते अभी कुर्सी में बैठे ही थे कि, "ओय जीवन, इशरत मिंया के लिये जरा एक चाय लाना", मालिक के लड़के की आवाज कानों में पड़ी। इशरत अली को लगा कि जरूर कोई ख्‍वाब देख रहे हैं। अली को अचानक लगने लगा जैसे पुराने मालिक लौट आये हों। "देखो इशरत मिंया, अपनी इन बुढ़ी होती हड्‌डियों को कब तक सजा देते रहोगे", इशरत अली के कानों में एक बार फिर जैसे पिघला सीशा घुल आया हो। कुर्सी का ही असर था शायद, अली बोले, "क्‍यों मजाक करते हो बरखुदार, गरीब की हड्‌डियाँ भी कभी बुड़ी होती हैं"। "लो मिंया चाय पियो", जीवन चाय रख गया था। दुकान मालिक फिर से बोला, "देखो मिंया, तुम तो जानते ही हो आजकल धंधा पहले से मंदा हो गया है। आमदनी कम हो गयी है और खर्चे तो कम होते ही नहीं"। दुकान मालिक के समझ नही आ रहा था कि इशरत को कैसे बोले जाने को। "जीवन, इशरत मिंया का पैकेट लाना तो" दुकान मालिक आवाज ऊंची करके बोला। इशरत को अंदर छुपा डर आँखों के सामने आता दिखा। दुकान मालिक एक बार फिर इशरत के जानिब मुखातिब हुआ, "देखो इशरत मिंया, तुम बाबूजी के जमाने से दुकान के साथ हो इसलिए अब तुम्‍हें खाली हाथ तो जाने नहीं दूंगा, इसलिए यह एक छोटा सा तोहफा कबूल कर लो", और फिर आगे बोला, "देखो मिंया, कभी भी किसी तरह की जरूरत हो तो बेहिचक चले आना"। इशरत अली का शरीर बर्फ की मानिंद ठंडा हो गया था, अली को लगा दुकान मालिक ने उन्‍हें जो चाय पिलायी थी वह चाय नही उनके अपने ही शरीर का लहू था। इशरत को अभी भी यकीन नही आ रहा था कि जो सुना वो उन्‍हें ही कहा गया है। "अच्‍छा मिंया, खुदा आफिज । कभी कभी दुआ सलाम करने आ जाना"। इशरत सोच रहे थे उनकी सबसे बड़ी जरूरत तो छीन ली अब क्‍या खाके ये मदद करने की बात कह रहा है।

खुदा आफिज कह इशरत थके कदमों से पैदल ही घर की ओर चल दिये। नौकरी खोने के बाद टैम्‍पो में जाने की बात सोच भी नही सकते थे। "साला कम्‍बख्‍त दिन ही मनहूस है", अल-सुबह पहले नामाकूल छोकरा मोपेड ले कर निकल गया, उसके बाद टैम्‍पो में चिकपों और फिर दुकान पहुँच के मालिक ने इज्‍जत बख्‍श के जो गर्दन हलाल की है उसने तो कमर ही तोड़ दी। आमदनी का कोई जरिया नही, लड़के के कमाने के कोई लक्षण नही, इशरत अली की सोच बदतसूर जारी थी। पलक का निकाह भी तो कराना है, "या खुदा आज ही ये दिन दिखाना था"। इशरत अपनी सोच से बाहर निकले, सामने ही हवेली थी।

जैसे ही हवेली के अंदर घुसे, नसीबन की आवाज सुनायी दी, क्‍यों मिंया तबियत तो खैरियत से है ना, आज इतनी जल्‍दी तशरीफ कैसे ले आये। इशरत ने नजर उठा के देखा नसीबन नल के पास कपड़े धो रही थी।..............

यहाँ तक पहुँच के एक ब्रैक लिया, लेकिन फिर शुरू करने से पहले पता चला कि खुदा को इशरत के लिए कुछ ओर ही मंजूर था।

Monday, June 06, 2005

सुन मेरे मौला

मेरे मौला, मेरा रहनुमा बन तू मेरे साथ में चल
अपने कल का भरोसा नही मुझको
कम से कम आज तो तू मेरे साथ में चल।

धर्म के नाम पर आदमी ने दिये तुझको नाम कई
बनाया मंदिर, कहीं मस्‍जिद और बनाये चर्च कहीं।
तू सिर्फ एक है, इस बात को तो ये लोग भूल गये
इनको ये एहसास दिलाने तू मेरे साथ में चल।

कहीं मस्‍जिद को तोड़ा, तो कभी मंदिर जलाये
आदमी ने आदमी से ये सभी काम कराये।
अपने कर्मो का इन्‍हे आज भी नही कोई अफसोस
इनको ये एहसास दिलाने तू मेरे साथ में चल।

पहले दंगे कराये, फिर कई मासूम जलाये
मेरे मौला तूने ये कैसे इन्‍सान बनाये।
अपने कर्मो से ये कहीं हैवान न बन जायें
इनको इक नयी राह दिखाने तू मेरे साथ में चल।

'तरूण' देखा नही जाता, धर्म के नाम पर ये सब
इंसॉ के अदंर का भस्‍मासूर न जग जाये कहीं अब।
इससे पहले कि ये आये, और मिटाये तूझी को
इनके दिलों से खुद को मिटाने तू मेरे साथ में चल।