पिछले साल लिखी चंद लाईने, इस साल देवनागिरी में।
नेता
इलेक्शन के इस दौर में, मची हुई है होड़
कहीं हो रहे वायदे, कहीं बन रही रोड।
संसद अपनी बन गयी जंग का मैदान
नेता तो ये रहे नही, बन गये हैवान।
एक नही, दो नही, कई पार्टी बदलते रहते हैं
चाहे जिसमें भी रहें, घोटाले करते रहते हैं।
हमसे वायदे पहले किये, किया नही कुछ काम
पीने को कहीं पानी नही, ये टकराते जाम।
राजनीतिक पार्टी
डेमोक्रेसी का नेताओं ने कैसा खेल निकाला है,
उसकी अपनी पार्टी है, मेम्बर वो अकेला है।
Tuesday, May 31, 2005
नेता और राजनीतिक पार्टी
Tuesday, May 17, 2005
इलेक्सन स्पेशियल
पिछले साल, चुनाव के दौरान कुछ पंक्तियां लिखीं थीं सोचा चलो आज इन्हें हिन्दी मे लिख दिया जाय। ब्लागनाद तो इनका पहले ही हो चुका है।
इलेक्सन का शोर है, देखो चारों ओर
सफेद कपड़े पहन के, घूम रहे हैं चोर।
घूम रहे हैं चोर, मचा रहे हल्ला गुल्ला
इनके कस्मे-वादों से, गुंज रहा हर गली मुहल्ला।
इनकी कोई जात नही, फैलाते जातिवाद हैं
सिंगिल कुर्सी न मिले, तो करते बंदर-बांट हैं।
करते बंदर-बांट, देते हैं एक दूजे को गाली
देश में बिजली है नही, इनके घर रोज दिवाली।
Monday, May 16, 2005
मुंगेरी (एक कहानी) - ३
गतांक से आगे.....
क्या करे क्या न करे मुगेरी की समझ नही आ रहा था, उसे यूँ बैठे हुए काफी देर हो गयी। अब तक रात का धुंधलका भी छाने लगा था। उसके पेट मे भूख से चूहे दौड़ने लगे, पास पर ही एक खाने का ठेली वाला नजर आया तो मुंगेरी उसी ओर चल दिया।
पेट पूजा करके उसे थोड़ी राहत मिली, अब उसके सामने समस्या थी रात गुजारने की। मुंगेरी ऐसे ही सड़क किनारे टहलने लगा, अपनी धुन मे चलते हुए वह काफी दूर निकल आया। सड़क पे सरपट दौड़ती गाड़ियों का शोर कम होने लगा लेकिन अभी भी ऐसा लगता था जैसे दिन का उजाला फैला हुआ हो। उसके गाँव में तो रात होते ही ऐसा अंधकार छा जाता जैसे मरघट, जैसे कोई रहता ही ना हो। उसे भी अब नींद अपने आगोश में लेने लगी और उसके पास सोने का ठिकाना न था। रहने के लिए कोई सस्ता सा होटल या धर्मशाला भी उसे आसपास नजर नही आ रही थी। वाह री किस्मत आकाश छूती इमारतों के होते हुए भी एक इंसान आशियाँ तलाश रहा था। तभी उसने देखा सामने ही फुटपाथ पर कुछ लोग सोये हुए थे। वो भी उस ओर चल दिया, थोड़ी देर मुंगेरी पास ही खड़ा सोचता रहा। लेकिन उस पे नींद इतनी हावी हो चली थी कि वह सारा संकोच छोड़, अपनी संदुकची से चादर निकाल वहीं पर लम्बा हो गया।
किसी की ठोकर से उसकी नींद खुल गयी, चादर हटाके देखा तो कोई पुलिस वाला था। "क्या है हवलदार साहेब", मुंगेरी बोला। "शहर में नये आये हो बरखुदार" हवलदार बोला। मुंगेरी सोच मे पड़ गया कि इसको कैसे मालूम, "क्यों बे सुनायी नही दिया, क्या पूछा" हवलदार की कर्कश आवाज उसके कानों में पड़ी। मुंगेरी के हाँ में जवाब देते ही पुलिसिया बोला, "यहाँ क्या बाप की जागीर समझ के सो रहा है"। "क्यों साहेब बाकी लोग भी तो सोये हैं" मुंगेरी हिम्मत करके बोला। "पाँव पालने में पड़े नही और हमसे कुश्ती" हवलदार थोड़ा उखड़ने लगा था। हवलदार बेशरमी से बोला, "ये तो इनके बाप की जगह है यहाँ सोयें या मूते इनकी मर्जी"। उसकी बात सुन मुंगेरी बगले झाँकने लगा, "अबे ये उल्लू की तरह क्या देख रहा है, चल उठ और यहाँ से दफा हो जा"। मुंगेरी किसी तरह हिम्मत करके फिर बोला, "साहेब, बस आज रात सोने दो। कल सुबह होते ही चला जाऊंगा"। अंधा क्या चाहे दो आँखे, यह सुनते ही हवलदार बोला "ठीक है आज सोजा लेकिन टैक्स पड़ेगा"। "टैक्स! वो क्या" मुंगेरी ने पूछा। "जैसे हाऊस टैक्स, इन्कम टैक्स वैसे ही फुटपाथ टैक्स" जवाब मिला। "चल जल्दी से बीस का पत्ता निकाल और पड़ा रह आराम से यहाँ" हवलदार फिर बोला। मुंगेरी ने बीस का एक नोट निकाल आगे बड़ा दिया।
उन दोनो की बातचीत से मुंगेरी के पड़ोस मे सोया आदमी जग चुका था। वो मुंगेरी से बोला "क्या बात हो गई भाई"? मुंगेरी ने शुरू से लेकर अब तक की अपनी राम कहानी सुना दी। सब सुन कर वो बोला, "मेरी मानो तो सुबह होते ही वापसी की गाड़ी पकड़ लो, अभी भी कुछ नही बिगड़ा"। मुंगेरी ने उसकी बात अनसुनी कर पूछा, "भैय्या एक बात बताओ, वो पुलिस वाले ने तुम से टैक्स क्यों नही लिया"। आदमी बोला "हम हैं भिखारी, दिन भर भीख माँगते हैं रात को यहाँ आकर सो जाते हैं, रहा सवाल टैक्स का तो उसका अपना महीने का बंधा हुआ है। सोने के लिए मिली २ गज जमीन का किराया समझो या चाहे कुछ, हर महीने देना ही पड़ता है। अब इस शहर मे रहोगे तो धीरे-धीरे सब समझ जाओगे। बाबू ये शहर है यहाँ का हर इलाका बंटा हुआ है - पुलिस में, भिखारियों में, चोरों में", "पुलिस में भी!" मुंगेरी भिखारी कि बात काट के बोला। "कुछ गिनती के वर्दी वालों को छोड़कर", भिखारी ने जवाब दिया। "तभी कह रहा हूँ लौट जाओ यहाँ जिन्दगी इतनी आसान नही है।" मुगेरी को चुप देख उसको लग गया ये अभी तो लौटने वाला नही दिखता इसलिए बोला, "देखो भैय्या अपने को तो भीख मांगने की आदत सी पड़ गयी है इसलिए हम तो कोई काम करने से रहे लेकिन अगर तुम चाहो तो तुम्हे कल एक आदमी से मिलवा सकता हूँ शायद वो कुछ कर दे तुम्हारे लिए"। मुंगेरी सोच रहा था कि इस भिखारी की बात का विश्वास करे कि नही, भिखारी की बात भला कोई क्यों मानेगा, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा काफी इसलिए बोला, "तुम्हारा ये एहसान कभी नही भूलूँगा"। "एहसान भूल भी जाओ तो चलेगा लेकिन कल अगर कुछ कमाने लग जाओ तो इस भिखारी को भीख देना मत भूलना। इसी से अपनी रोजी रोटी चलती है, किसी के एहसान से अपना पेट भरने वाला नही", भिखारी ने जवाब दिया।
................................................................................................. क्रमशः
Sunday, May 15, 2005
एक पाती प्रीटी वूमेन के नाम
10 वीं अनुगूँज का विषय रखा गया - "एक पाती ‘…’ के नाम"। अब पाती लिखे तो हमें जमाना बीत गया, ऊपर से समस्या थी कि पाती लिखे तो किस के नाम, और किस विषय को ले कर। याद आया कि विषय को लेकर थोड़ी छूट मिली हुई है पाती के लिए यूँ ही गप-सड़ाका भी लिख सकते हैं। फिर याद आया कि कभी ‘इ-चर्चा’ की वर्षगांठ पर सभी सदस्यों के नाम मिलाकर कर एक पाती लिखी थी, सोचा क्यों न उसी को यहाँ लिख दिया जाय। तो इस अनुगूँज के लिए पेश है- ‘एक पाती प्रीटी वूमेन के नाम’।
ओ मेरी प्यारी ‘प्रीटी वूमेन’,
तुम मेरी जिन्दगी की ‘सुपर गर्ल’ हो, तुम्हारी वो प्यारी-प्यारी ‘स्मेलीफिंगर’, वो खुबसूरत ‘नेत्र’। जब भी तुमको सोचता हूँ, मेरा ‘शीना’ (सीना पढ़े) जोरों से धड़कने लगता है। मै वाकई मे तुम्हारा ‘ब्वायफ्रैंड’ बनना चाहता हूँ। मै समझ सकता हूँ, तुम सोच रही होगी कि आखीर मै हूँ कौन। इसलिए थोड़ा मै तुम्हे अपने बारे मे भी बता दूँ।
मै हूँ ‘प्राउड हिंदुस्तानी’, एक सच्चा ‘देशप्रेमी’ मूलतः एक ‘इंडियन सीटीजन’।
जब मै अमेरीका आ रहा था तो मै ‘स्मार्टगांडू इन यूके’ से मिला और उसी ने मुझे तुम्हारे बारे मे बताया। तब से तुम्हे ढूंढने के लिए मैने क्या-क्या ना किया, मै ‘तांत्रिक योगी’ के पास गया, मैने ‘देशीबाबा’ से तुझे ढूंढने को जादू-मंतर पूछा लेकिन कुछ भी फायदा नही हुआ। फिर एक दिन तू मुझे एक पल के लिए ‘इ-चर्चा’ मे दिखी तो मेने ये इ-पत्र लिखना शुरू किया।
जब मै इंडिया मे था तो मै एक ‘शिव सैनिक’ था, और मेरा काम हर एक ‘दलित’ को अपनी पार्टी मे शामिल करना था। लेकिन मै तुम्हे बताऊं संभवत शायद मै एक ‘आर्यपुत्र’ था इसलिए मुझे ये ‘डर्टी’ पालिटिक्स पसंद नही आयी। उस वक्त कालेज से निकले ही थे इसलिए कुछ जवानी का जोश भी था, मै अपने को बड़ा ‘जांबाज’ समझता था। जेम्स बांड की मूवी देख देख के अपने को किसी ‘धुरंधर’ से कम नही समझता था। इसलिए पालिटिक्स को लात मार मै भी ‘लाल लंगोट’ बांध अमेरिका आ गया।
तुम सोच रही होगी कि मै भी कितना बड़ा ‘कमीना’ हूँ, ना जान ना पहचान और तेरे गले पड़ रहा हूँ, लेकिन ऐसा नही है मै तो यहाँ साफ्टवेयर की दुनिया का ‘शहंशाह’ बन ने आया हूँ। मै कोई ‘घसयारा’ नही जो ‘शहंशाह’ ना बन सकूँ। हाँ तो मै तुम से यहाँ आने की ‘इ-चर्चा’ कर रहा था। एयरपोर्ट मे उतरते ही मुझे ‘मद्रासी बाबू’, ‘बाबू हैदराबादी’ टाईप की फीलिंग वाले लोग दिखने लगे। मेरे ‘नेत्र’ किसी नार्थ के बन्दे की तलाश मे थे, तभी अचानक मुझे एहसास हुआ कि मेने किसी को टक्कर मार दी है। मेने देखा तो वह ‘द रॉक’ के साथ एक गहरी टक्कर थी। तभी मुझे २-३ नार्थ टाईप बन्दे दिखे तो मेने उन्हे हॉय हैलो किया और उन्होने मुझे अपना नाम ‘बिग-जी’, ‘जी-पेल’ और ‘वाइकिंग’ बताया। इन अजीब नामों को सुन के मुझे वाकई लगने लगा कि मै अमेरिका पहुँच गया हूँ।
कम्पनी के गेस्ट हाऊस पहुँच कर मै सबसे पहले नहाने गया और घंटो नहाता रहा क्योंकि कोई ये कहने वाला नही था कि ‘राहुल’ जल्दी करो पानी चला जायगा। एयरपोर्ट मे ‘द रॉक’ के साथ हुई गहरी टक्कर से मेरे बदन मे दर्द हो रहा था इसलिए मेने अपने साथ लायी ‘झंडु’ बाम की शीशी निकाली और अपने शरीर मे थोड़ी मल ली उसे लगाने से थोड़ा आराम मिला। अगले दिन सुबह-सुबह मेने ‘राइजिंग सन’ देखा वो बहुत सुंदर द्रश्य लग रहा था, मुझे थोड़ी देर के लिए ‘नंदिनी’ की याद आ गयी, ‘नंदिनी’ मेरी पूर्व प्रेमिका, उसे सन राइज देखना बहुत पंसद था।
उसके बाद जब मै घुमने निकला तो यहाँ के बड़े-बड़े हाइवे देख के मेरी ‘खोपड़ी’ घूम गयी। फिर उस रात ‘मैन ऑफ लामंचा’ नाम के एक रेस्ट्राँ मे मैने डिनर किया।कहते हैं कि वो पहले किसी ‘आरेंगजेब’ का था, जिसे अपने भाई के साथ धोखा करने के जुर्म मे पुलिस पकड़ के ले गयी थी। आजकल उसे कोई ‘खान बाबा’ चलाते हैं। रेस्ट्राँ से बहुत ज्यादा ‘किंगफिशर’ पी कर मे गेस्ट हाउस वापस पहुँचा, वहाँ के सूनेपन से मुझे बहुत ‘होमसिक’ टाईप फीलिंग आयी, ‘करूणा’ भरे चेहरे याद आने लगे।
यहाँ एक बात मेरी समझ मे नही आयी कि हम सब लोग तो यहाँ ‘विदेशी’ हैं फिर क्यों एक दूसरे को देशी कहते हैं। ऐसे ही दिन गुजरने लगे। एक दिन फिर मै न्यूयार्क गया, इंडिया मे अपने शहर मे छोटी-छोटी गलियां हुआ करती थीं यहाँ ‘बिग-ग’लियां थीं। टाईम स्कवायर मे रात के वक्त ऐसा लगा जैसे सैकड़ों ‘चिराग २०००’ वोल्ट के जल रहे हों। वक्त गुजरने के साथ-साथ मेरा स्टेटस भी एन आर आइ का हो गया लेकिन मै अपने को ‘इ-एनआरआइ’ कहलाना पंसद करता था। एन आर आइ होते ही मै अमेरिका की बड़ी-बड़ी बातें करने लगा और इंडिया मुझे एक बेकार सा देश लगने लगा।
मै भी अपने पड़ोसी ‘फ्रेंक ऐलन’ की बहिन ‘केट’ के साथ नैन मटक्के करने लगा, लेकिन उन्ही दिनों ऐसा जोर का ‘पर्फेक्ट स्टार्म’ आया कि जगह-जगह से मेरे जैसे कंसलटेंट बेंच मे आने लगे, जगह-जगह लेऑफ होने लगे। मुझे फिर से ‘लालू प्रसाद यादव’ और ‘राबड़ी देवी’ वाला देश याद आने लगा। एक दिन फिर मुझे ‘बड़ा भाई’ मिला, मैने जब उसे सब बताया तो उसने ही कहा कि इस से पहले कि तेरी ‘प्रीटी वूमेन’ कहीं रन-वे ब्राइड ना हो जाय उसको पाती (लैटर) लिख डाल और मै पाती लिखने बैठ गया।
यही है मेरी कहानी, अब ज्यादा ‘दीसएनदैट’ ना करते हुए मै इतना ही कहूँगा कि मुझे आशा है, मेरी कहानी सुन के तू मेरी दोस्ती का पैगाम अपना लेगी और मै भी दुनिया से ‘सीना’ फुला के कह सकूंगा कि वो ‘स्मेलीफिंगर’ वाली, वो ‘मनोहर’ चेहरे वाली, वो बड़े-बड़े ‘नेत्र’ वाली ‘प्रीटी वूमेन’ मेरी ‘सुपर गर्ल’ है।
तुम्हारा ही ‘प्रोफेसर पगला कहीं का’
‘आवारा दोस्त’
Sunday, May 08, 2005
उत्पत्ति 'निठल्ला चिन्तन' की
आज 'अपनी दुनिया' का कलेवर बदलने के बाद सोचा क्यों न अब कुछ 'निठल्ला चिन्तन' ही कर लें। सबसे पहला सवाल उठा कि भैय्या विषय क्या चुना जाय, काफी सोचने के बाद ये निष्कर्ष निकला कि चलो आज 'निठल्ला चिन्तन' की उत्पति के बारे मे कुछ लिखा जाय।
पिछले साल की शुरूआत मे इस नाचीज को 'ब्लोग' के ' ब् ' तक का कुछ इल्म न था। फिर इक दिन कुछ हुआ यों कि सर्फ करते करते रेडिफ डॉट कॉम के 'ब्लोग' बटन पे क्िलक कर लिया, बस फिर क्या था घर जाने से पहले अपने नाम का भी एक ब्लोग था इंटरनेट की इस मायावी दुनिया में, और अपने इस अंग्रेजी ब्लोग का नाम रखा गया 'माय लोनली प्लेनेट'। साथ ही इस बात का भी एहसास हुआ कि भले ही इस दुनिया मे एक नाम के दो या दो से ज्यादा लोग हो जायें लेकिन इंटरनेट की इस मायावी दुनिया मे ये संभव नही। बरहाल थोड़ी सी कोशिशों के बाद हमै नाम मिल ही गया। ४-५ महीने इसी जगह 'इधर उधर' की हाँकते रहे, 'मेरा पन्ना' था सो जो जी मे आया 'तत्काल' कह दिया। 'कुछ बतकही' 'ज्ञान विज्ञान' की करी तो फिर कुछ किया 'रोजनमचा'। 'अपनी बात' की 'अभिव्यक्ति' कभी 'प्रंसग' मे करी तो कभी 'कविता सागर' मे। कभी करी 'नुक्ता चीनी' और कभी 'ठलुआ' गिरी, जब कभी 'कही अनकही' छोड़ देने का मन किया तो बैठे रहे 'फुरसतिया' मे। ऐसा नही है कि हमेशा ही कुछ कहते रहे, कभी छुटि्यों मे कहीं 'नौ दो ग्यारह' हो गये तो अपने ब्लोग मे 'निरवता' भी छायी रहती। अगर कुछ नही किया तो वो था 'चिट्ठा चर्चा' और ना ही कभी करी 'कुछ बाते मेरे जीवन' की। 'हाँ भाई' तो अपनी 'हृदयगाथा' को यहीं 'अल्पविराम' देता हूँ, और जाता हूँ 'निठल्ला चिन्तन' की उत्पत्ति कि तरफ।
इसी बीच बन्दा अपना बोरिया बिस्तरा गर्म प्रदेश से समेट चला आया ठंडे प्रदेश मे, कहने का मतलब है फ्लोरिडा से मुँह उठा चले आये न्यूजर्सी। पोस्टल अड्रैस बदलने के बाद बारी आई वर्चुवल अड्रैस की, और जा पहुँचे 'ब्लोगस्पॉट डॉट कॉम'। अंगुल करने की आदत शुरू से ही रही है तो एक दिन 'ब्लोगर बार' के 'नेक्सट बलोग बटन से छेड़कानी कर बैठे और नतीजा यह हुआ कि जा पहुँचे अतुल के 'रोजनमचा' मे। हिन्दी मे ब्लोग देख के अपनी तो आँखे ही खुली रह गयीं। इससे पहले की कुछ समझ पाते बॉस के कदमों की आहट सुनायी दी और अपना ब्राउजर बंद। फिर घर से 'रोजनमचा' की ढूँढ खोज शुरू की, इसको मिलना न था सो नही मिला। हम भी हथियार डालने वाले नही थे इसलिए जा पहुँचे संकटमोचक गुगलदेव की शरण मे। अगले ही पल रास्ता हमारे सामने था। आनन फानन हिन्दी ब्लोग शुरू करने की ठान ली, फिर बात वहीं नाम मे आके अटक गयी काफी सोच विचार के नाम रखा 'निठल्ला चिन्तन' और वेब अड्रैस शुरू किया 'अपनी दुनिया' के नाम से, तुरंत ही 'टेस्ट चिट्ठा' भी डाल दिया। और फिर एस वी और जीतू के आगमन के साथ ही लोगों का आना शुरू हो गया। एक दिन टाईप करने का रोना रोया तो रमण ने अगले ही दिन काफी सारे साधन बता दिये। इसी बीच पता चला पहली ब्लागजीन 'निरन्तर' का। अभी उसे पढना शुरू ही किया था कि जीतू भाई ने 'ब्लागनॉद' की घोषणा कर डाली। इस तरह हिन्दी ब्लॉगरस की दुनिया मे अपना भी सफर शुरू हो गया। बस यही थी 'निठल्ला चिन्तन' के उत्पत्ति की कहानी।
