Saturday, April 23, 2005

मुंगेरी (एक कहानी) - २

गतांक से आगे.....

मुंगेरी बड़ा खुश था उसने दिल्‍ली जाने वाली ट्रैन जो पकड़ ली थी। लेकिन अन्‍दर से एक डर था मन मे, अन्‍जान शहर और वो कभी अकेला किसी शहर कभी गया भी नही था। एक गाँव से दुसरे गाँव यही एक सफर उसने अकेला किया था, उसमे भी अक्‍सर कोई यार-दोस्‍त साथ मे होता ही था। लेकिन सब से बड़ा डर उसे अपने आप से था वह जानता था गाँव वाले उसके बारे मे क्‍या सोचते हैं। उसे लगता था कि कहीं उनकी बात सच मे सही ना हो जाये, मौसम बदले और साथ मे उसका सपना भी। यह बात सोच के ही उसके अन्‍दर एक सिरहन सी दौड़ गयी, उसे अपने अन्‍दर कहीं कुछ टूटता सा लगने लगा।

'चाय-चाय' की आवाज से उसकी ये सोच टूट गयी, नजर उठा के देखा तो ट्रैन किसी स्‍टेशन पर खड़ी थी। उसने साथ वाले यात्री से पूछा 'भैय्‍या कौन सा स्‍टेशन है', मेरठ उसने जवाब दिया। 'अभी दिल्‍ली कितनी दूर है' मुंगेरी का अगला सवाल था। 'यही कोई एक सवा एक घंटा और लगेगा' जवाब मिला। मुंगेरी की चाय पीने की इच्‍छा हुई लेकिन बाहर जाने मे ट्रैन छुटने का डर था, इसलिए सोच रहा था कि क्‍या किया जाये। इतने मे एक छोटा बच्‍चा खिड़की के पास आके बोला, 'बाबुजी चाय पियोगे सिर्फ एक रूपये मे'। मुंगेरी के हाँ कहते ही उसने प्‍लास्‍टिक के एक कप मे चाय पकड़ा दी, मुंगेरी ने उसे एक रूपया पकड़ा दिया।

ट्रैन फिर चल पड़ी थी, और मुंगेरी सोच रहा था कि इतने बड़े-बड़े लोगों के होते हुए भी यह छोटा सा बच्‍चा क्‍यौं काम कर रहा है। उसकी उम्र मे वह दिनभर कन्‍चे ही खेला करता था। अपनी सोच को झटक कर वह बाहर देखने लगा। पेड़, मकान, आदमी, गाड़ियाँ सब पिछे छुटते जा रहे थे। शायद दिल्‍ली आने वाली थी, क्‍योंकि लोग अपना-अपना सामान संभालने लगे थे। मुंगेरी ने भी अपनी छोटी सी टिन की संदुकची संभाल ली थी। गाँव वाले का पता निकाल कर हाथ मे रख लिया कि ढूंढने मे आसानी रहेगी। ट्रैन दिल्‍ली पँहुच गयी थी, वह भी दरवाजे की तरफ बढ़ गया। जब उसने दरवाजे पे पँहुच के बाहर देखा तो बहुत ही भीड़ थी, इतने लोग एक साथ एक जगह शायद उसने गाँव के ही मेले मे देखे थे। अभी वह सोच ही रहा था कि पाँव कहाँ र‍खूँ , तभी पीछे से आवाज आयी, 'अबे यँही खड़ा रहेगा कि आगे भी बड़ेगा'। इससे पहले की वह कुछ जवाब दे पाता एक जोर के झटके ने उसे प्‍लेटफार्म मे ला खड़ा कर दिया।

इतनी भीड़, नयी जगह उसे पता ही नही चल रहा था कि बाहर निकलने के लिए किधर जाये। भीड़ के धक्‍के उसे जिधर लेते गये वह उधर ही बढ़ता गया और थोड़ी देर मे उसने अपने आप को स्‍टेशन से बाहर जाने के गेट पर खड़ा पाया। टिकिट कलेक्‍टर के मांगने पर उसने जेब से टिकिट निकाल के बड़ा दिया और आगे बढ़ गया। तभी उसे ध्‍यान आया कि उसके हाथ मे जो गाँव वाले का पता था वो भीड़ के धक्‍कों मे कहीं खो चुका था। यह देख के उसकी आँखे भर आयी, इतने बड़े शहर मे एक ही जानने वाला था और उसका पता अपनी बेवकूफी से वह खो चुका था।

इतने लोगों के होते हुए भी वह बिलकुल अकेला था, अन्‍जान जगह, न जान पहचान और न ही कोई रहने का ठिकाना। असहाय सा वो वहीं सीढ़ी पर बैठ गया।

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Thursday, April 21, 2005

आशा ही जीवन है

आशा ही जीवन है, सुनने मे बड़ा अच्‍छा लगता है लेकिन अगर देखा जाये तो अपने देश में क्‍या ये संभव है। क्‍योंकि आशा स्‍त्रीलिंग है, जीवन पुलिंग और अपने देश में Anugoonja आशा और जीवन के बीच कितना अन्‍तर है ये बताने की जरूरत नही है। जहाँ आशा को किसी श्राप से कम नही समझा जाता हो वहाँ कैसे कह सकते हैं कि आशा ही जीवन है।

आशा ही जीवन है, इसी सोच के साथ रोज एक नई पार्टी का जन्‍म होता है। नेता दल बदलते रहते हैं कि शायद किसी पार्टी से तो टिकिट मिलेगा, कोई पार्टी तो बहुमत मे आयेगी, कोई तो मंत्री बनायेगा। इसी आशा की चाह में अपने प्रधानमंत्री एक बहुत ही करारी हार के साक्षी बने, क्रिकेट के मैदान में, देश की राजधानी में, प्रतिद्वंदी टीम के राष्‍ट्रपति के सामने। यही आशा तो है जो लाखों लोगों को अपना काम छोड़ के टीवी के आगे बैठने में मजबूर करती है कि कभी तो शायद अपने भी महारथी कुछ कर दिखायेंगे।

शायद इसी आशा के दम पर कुछ लोग विलुप्‍त होती अपनी राष्‍ट्र भाषा को जिंदा रखे हुए है। और ये आशा ही है जो शायद आदमी को नपुंसक बनाती है, क्‍योंकि 'आशा ही जीवन' की माला जपते हुए वो हाथ मे हाथ रख कर बैठा रहता है।

और ये आशा ही है जो छोटे-छोटे बच्‍चों को देख कर मुझे भी ये कहने मे मजबूर करती है कि शायद 'आशा ही जीवन' है।

Friday, April 15, 2005

मुंगेरी (एक कहानी)

इन से मिलये, ये हैं मुंगेरी, वैसे तो इनका नाम बजरंगी है, लेकिन जब से ये सोते जागते सपने देखने लगे गांव वालो ने इनका नाम मुंगेरी रख दिया॥ बाप का क्या नाम है यह तो नही मालूम लेकिन गांव में सब उन्हें र्मिची सेठ कहके पुकारते हैं, सुना है ये पहले र्मिची बेचने का काम किया करते थे इसलिए इनका ये नाम पड़ गया॥ हाँ तो हम बात कर रहे थे मुंगेरी की, इनकी कथा आगे बडा़ने से पहले इनकी थोडी़ और तारीफ कर दी जाय॥

छोटा कद "मुंगेरी लाल के हसीन सपने" के रघुवीर यादव सा,छोटे से चेहरे में "मंगल पांडे" के आमीर जैसी मुँछे, खोपडी़ "पडो़सन" के महमूद जैसी और पहनावा वही धोती वही कुर्ता ॥ मुशकिल से आठवीं पास, लेकिन टीवी देखते-देखते ख्वाब बडे़-बडे़, बिल्कुल मौसम की तरह इनके सपने भी बदलते रहते, आजकल नेता बनने का शौक चढा़ हुआ है॥ शौक चाहे जैसा भी हो, सपने चाहे जो भी हों पर अपना मुंगेरी दिल से बहुत ही अच्‍छा और दिमाग से थोड़ा सुलझा हुआ इन्‍सान है॥

गाँव मे सभी जानते थे इसलिए यहाँ रह के यह काम तो होने ला नही था, आजकल इसी उधेड़ बुन मे थे कि ऎसा क्या किया जाय की जल्दी से नेता बन जांये॥ जब बडे़ बुढो़ ने समझाने कोशिश की कि भैय्या पहले थोडा़ पढ़ लो र्गेजवेसन (graduation) कर लो तो झट से जवाब दिया लालू किये थे क्या र्गेजवेसन, बस एक बार नेता बनने दो यूनिवर्सिटी वाले घर से बुला के डिगरी दे जायेंगे॥ बात मे दम था एसा होते हुए तो देखा ही था सो हो गये सब चुप॥ करते क्या बढे़ बुजुर्ग सब अगले मौसम का इंतजार करने लगे॥ कभी तो मौसम बदलेगा और नेता बनने का भूत खोपडी़ से उतरेगा॥

लेकिन कुछ बात बनते नही देख अपने मुंगेरी की बैचेनी बढ़ती जा रही थी॥ एक दिन किसी चाहने वाले ने कान मे बात डाल दी कि नेता बनना है तो दिल्ली चले जाओ, मुम्बई मे तो काम बनेगा नही॥ "वो भला क्यों" मुंगेरी ने पुछा, वो इसलिए की सीधे तो कोई नेता बनने का टीकीट देगा नही, हीरो बनने लायक तुम हो नही कि एक बार हीरो बन गये फिर राजनीतिक पार्टी वाले घर आके पैर पकड़ के बोलेंगे भैय्या हमारी पार्टी कब ज्वाइन कर रहे हैं॥ इसलिए एक ही रास्ता है की दिल्ली चले जाओ और किसी तरह "सॉस बहू___" वाली छोरी के किसी सीरियल मे कोई काम ले लो॥ चल भाग, मुंगेरी ने झीटक दिया, कला और राजनीति का कोई साथ है भला॥ तो ठीक है भैय्या यहीं गाँव में पडे़ रहो, दूसरे ने ताना मारा॥ मुंगेरी हाथ से बात निकलती देख बोले लेकिन हम एक्टिंग कैसे करेंगे हमे तो कुछ आता नही॥ पहले वाले ने याद दिलाया, अरे भैय्या पार साल गाँव की रामलीला मे राम की सेना मे बंदर बने थे कि नही, बस वैसे ही तो करते हैं एक्टिंग॥ मुंगेरी को बात जंच गयी और उसने अगले ही दिन दिल्ली जाने की ठान ली॥ अगले दिन सुबह अंधेरे मे बाप की अंठी से कुछ रूपया-पैसा चुरा और थोडा़ सामान ले मुंगेरी ने पकड़ ली दिल्ली जाने वाली र्टैन (Train)॥ चाहने वालों ने पहले ही गाँव के किसी आदमी का पता दे दिया था जो दिल्ली मे कहीं रहता था॥

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Sunday, April 03, 2005

अपडेट

Civilization के बुखार से किसी तरह निजात पायी तो अब सोच रहा हूँ कि कुछ निठल्ला चिन्तन कर लिया जाय॥ सबसे पहले layout change....कडि़यॉ तो पहले ही जोड़ ली हैं॥