Tuesday, December 20, 2005

तलाश

गुरू गोविंद दोऊ खड़े, काके लांगू पाँउ, बलिहारी गुरू आपनो, गोविंद दियो बताय। कबीर खुशनसीब थे जो उन्‍हें ऐसा गुरू मिला कि गुरू और गोविंद का फर्क पता चल गया। अब अपनी समस्‍या भी कुछ ऐसी ही है, ना गुरू का पता ना गोविंद का। अब लगे हाथ ये भी बताते चलें कि ये सब किस संदर्भ में कहा जा रहा है।

यह सब कहा जा रहा है इंडीब्लागीस के नामांकन के लिये। गुरू का पता तो आप लोगों कि टिप्‍णियों से चलेगा लेकिन गोविंद हैं इंडीब्लागीस की अलग-अलग श्रेणियां। खबर से लगता है कि एक ही श्रेणी के अंतर्गत नामांकन हो सकता है और यहीं समस्‍या खड़ी होती है। भला कौन सी श्रेणी चुनें निट्ठले चिन्‍तन के लियें। हमारी गुरू गोविंद की तलाश अभी जारी है तब तक आप अपना नामांकन करते रहें क्‍या पता बिल्‍ले के भाग्‍य से कब कोई छिंका टूट जाय।

4 comments:

अनूप शुक्ला said...

चक्कर में मत पड़ो भइया हर श्रेणी के लिये अप्लाई करो। न जाने मिल जायें नारायण किस भेस में।

Debashish said...

इसमें संशय कहाँ हो रहा है आपको? हिन्दी के चिट्ठे तो वैसे भी बेस्ट ईंडिक ब्लॉग(हिन्दी) श्रेणी के लिये ही नामांकित हो सकते हैं।

Tarun said...

Sahi keh rahe ho Anupji, Debu bhaiya ek Angrezi ka blog bhi hai line me....

Nivedita Barua said...

kuch kaha hain padhna chahte hain toh padh lijiye!!!