Monday, June 13, 2005

बिखरती दुनिया

अरे नहीं जनाब, मुझमे वो कुव्‍वत कहाँ। मैं तो खुद अपनी ही किसी जद्दोजहद में उलझा हुआ था। टैम्‍पो रूका हुआ था, इशरत अली सोच रहा था ना जाने कहाँ से ये नामाकूल थानेदार आ टपका, उसने बाहर झांक के देखा दुकान पास पर ही थी, अली ने टैम्‍पो से उतरने में ही भलाई समझी।

टैम्‍पो से ऊतर के इशरत अली अपने मुक्‍कदर् को कोसता हुआ दुकान की तरफ बढ़ गया। सलाम वालेकुम, इशरत अली कम्‍पयूटर आपरेटर को बोला. शायद उसके मुक्‍कदर् को अपने को कोसना पसंद नही आया तभी उसे आज अपनी गद्दी दुकान से नदारद दिखी। जिस डर को लेकर जी रहे थे वह सोच के ही बुढी होती हड्डियों में कंपकंपी सी छुट गयी। "मोहतरमा मेरी गद्दी का कुछ पता है", इशरत अली ने कम्‍पयूटर आपरेटर से पूछा। आपरेटर अन्‍जान बनते हुए बोली "मुझे नही मालूम मिंया, मालिक ही बेहतर जानते हैं"।

"सलाम वालेकुम जनाब", इशरत दुकान के मालिक के पास पहुँच के बोला। "और इशरत मिंया, तशरीफ से आये"। "हाँ जनाब, लेकिन लगता है आज लड़को ने सफाई के वक्‍त मेरी गद्दी कहीं रख दी"। "अरे मिंया आओ इधर बैठो" दुकान का मालिक इशरत की बात को अनसुनी करते हुए बोला। इशरत सोच रहे थे कि हंसे या रोयें, पहली बार दुकान मालिक के छोकरे ने इज्‍जत बख्‍शी थी। डरते डरते अभी कुर्सी में बैठे ही थे कि, "ओय जीवन, इशरत मिंया के लिये जरा एक चाय लाना", मालिक के लड़के की आवाज कानों में पड़ी। इशरत अली को लगा कि जरूर कोई ख्‍वाब देख रहे हैं। अली को अचानक लगने लगा जैसे पुराने मालिक लौट आये हों। "देखो इशरत मिंया, अपनी इन बुढ़ी होती हड्‌डियों को कब तक सजा देते रहोगे", इशरत अली के कानों में एक बार फिर जैसे पिघला सीशा घुल आया हो। कुर्सी का ही असर था शायद, अली बोले, "क्‍यों मजाक करते हो बरखुदार, गरीब की हड्‌डियाँ भी कभी बुड़ी होती हैं"। "लो मिंया चाय पियो", जीवन चाय रख गया था। दुकान मालिक फिर से बोला, "देखो मिंया, तुम तो जानते ही हो आजकल धंधा पहले से मंदा हो गया है। आमदनी कम हो गयी है और खर्चे तो कम होते ही नहीं"। दुकान मालिक के समझ नही आ रहा था कि इशरत को कैसे बोले जाने को। "जीवन, इशरत मिंया का पैकेट लाना तो" दुकान मालिक आवाज ऊंची करके बोला। इशरत को अंदर छुपा डर आँखों के सामने आता दिखा। दुकान मालिक एक बार फिर इशरत के जानिब मुखातिब हुआ, "देखो इशरत मिंया, तुम बाबूजी के जमाने से दुकान के साथ हो इसलिए अब तुम्‍हें खाली हाथ तो जाने नहीं दूंगा, इसलिए यह एक छोटा सा तोहफा कबूल कर लो", और फिर आगे बोला, "देखो मिंया, कभी भी किसी तरह की जरूरत हो तो बेहिचक चले आना"। इशरत अली का शरीर बर्फ की मानिंद ठंडा हो गया था, अली को लगा दुकान मालिक ने उन्‍हें जो चाय पिलायी थी वह चाय नही उनके अपने ही शरीर का लहू था। इशरत को अभी भी यकीन नही आ रहा था कि जो सुना वो उन्‍हें ही कहा गया है। "अच्‍छा मिंया, खुदा आफिज । कभी कभी दुआ सलाम करने आ जाना"। इशरत सोच रहे थे उनकी सबसे बड़ी जरूरत तो छीन ली अब क्‍या खाके ये मदद करने की बात कह रहा है।

खुदा आफिज कह इशरत थके कदमों से पैदल ही घर की ओर चल दिये। नौकरी खोने के बाद टैम्‍पो में जाने की बात सोच भी नही सकते थे। "साला कम्‍बख्‍त दिन ही मनहूस है", अल-सुबह पहले नामाकूल छोकरा मोपेड ले कर निकल गया, उसके बाद टैम्‍पो में चिकपों और फिर दुकान पहुँच के मालिक ने इज्‍जत बख्‍श के जो गर्दन हलाल की है उसने तो कमर ही तोड़ दी। आमदनी का कोई जरिया नही, लड़के के कमाने के कोई लक्षण नही, इशरत अली की सोच बदतसूर जारी थी। पलक का निकाह भी तो कराना है, "या खुदा आज ही ये दिन दिखाना था"। इशरत अपनी सोच से बाहर निकले, सामने ही हवेली थी।

जैसे ही हवेली के अंदर घुसे, नसीबन की आवाज सुनायी दी, क्‍यों मिंया तबियत तो खैरियत से है ना, आज इतनी जल्‍दी तशरीफ कैसे ले आये। इशरत ने नजर उठा के देखा नसीबन नल के पास कपड़े धो रही थी।..............

यहाँ तक पहुँच के एक ब्रैक लिया, लेकिन फिर शुरू करने से पहले पता चला कि खुदा को इशरत के लिए कुछ ओर ही मंजूर था।

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